राखी गढ़ी का इतिहास
राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले के नारनौंद उपमंडल में स्थित है। यहां राखीखास और राखीशाहपुर गांवों के अलावा आसपास के खेतों में पुरातात्विक साक्ष्य फैले हुए हैं। राखीगढ़ी में सात टीले (आरजीआर-1 से लेकर आरजीआर-7) हैं। ये मिलकर बस्ती बनाते हैं, जो हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी बस्ती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इस गांव में पहली बार 1963 में खुदाई शुरू की थी। इसके बाद 1998-2001 के बीच डॉ. अमरेंद्रनाथ के नेतृत्व में एएसआई ने फिर खुदाई शुरू की। बाद में पुणे के डेक्कन विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वसंत शिंदे के नेतृत्व में 2013 से 2016 व 2022 में राखीगढ़ी में उत्खनन कार्य हुआ है।
राखीगढ़ी में 1998 से लेकर अब तक 56 कंकाल मिले हैं। इनमें 36 की खोज प्रो. शिंदे ने की थी। टीला संख्या-7 की खुदाई में मिले दो महिलाओं के कंकाल करीब 7,000 साल पुराने हैं। दोनों कंकालों के हाथ में खोल (शैल) की चूड़ियां, एक तांबे का दर्पण और अर्ध कीमती पत्थरों के मनके भी मिले हैं। खोल की चूड़ियों की मौजूदगी से यह संभावना जताई जा रही है कि राखीगढ़ी के लोगों के दूरदराज के स्थानों के साथ व्यापारिक संबंध थे। प्रो. शिंदे के अनुसार राखीगढ़ी में पाई गई सभ्यता करीब 5000-5500 ई.पू. की है, जबकि मोहनजोदड़ो में पाई गई सभ्यता का समय लगभग 4000 ई.पू. माना जाता है। मोहनजोदड़ो का क्षेत्र करीब 300 हेक्टेयर है, जबकि राखीगढ़ी 550 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में फैला है। प्रो. शिंदे के अनुसार प्राचीन सभ्यता के साक्ष्यों को संजोए राखीगढ़ी में मिले प्रमाण इस ओर भी इशारा करते हैं कि व्यापारिक लेन-देन के मामले में भी यह स्थल हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से ज्यादा समृद्ध था।
अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, गुजरात और राजस्थान से इसका व्यापारिक संबंध था। खासतौर पर आभूषण बनाने के लिए लोग यहां से कच्चा माल लाते थे, फिर इनके आभूषण बनाकर इन्हीं जगहों में बेचते थे। इस सभ्यता के लोग तांबा, कार्नेलियन, अगेट, सोने जैसी मूल्यवान धातुओं को पिघलाकर इनसे नक्शीदार मनके की माला बनाते थे। पत्थरों या धातुओं से जेवर बनाने के लिए भट्ठियों का इस्तेमाल होता था। इस तरह की भट्ठियां भारी मात्रा में मिली हैं। यहां मिले कंकालों का डीएनए परीक्षण चल रहा है।
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